सत्यमेव जयते : दहेज की दर्दनाक दास्तां...

Hits: 2009 smaller text tool iconmedium text tool iconlarger text tool icon

satyamev-jayate-cartoon-hindiसत्यमेव जयते के तीसरे एपिसोड में आमिर खान आंसुओं की भीगी शुरुआत लेकर आए। दहेज। एक शब्द जो बना था नई गृहस्थी के सुंदर आरंभ को लेकर, लेकिन समाज के लालची लोगों के हाथों पड़कर इस हद तक विकृत हो गया कि सुनते ही कानों में जहर घोलने लगा। ना जाने कितनी अबोध और प्रतिभाशाली लड़कियां इस एक लफ्ज की आड़ में जलाई जा रही है, प्रताड़ित की जा रही है। एपिसोड के आरंभ से ही कलेजा इस कदर भर आया कि क्लैप बाई क्लैप आंखें बहती ही रही।

नाजों से पली, खुशियों में खिली नाजुक सी प्यारी कली जब अपनी मेंहदी रची एडियों से दहलीज पार कर ससुराल पहुंचती है तो ना जाने कितने कोमल अरमान उसके मानस में पल रहे होते हैं। अचानक सारे अरमान कांच की तरह टूटते-बिखरते हैं और फिर सारा जीवन ही किरचें-किरचें हो जाता है।

नई दिल्ली की कोमल सेठी से आरंभ हुई दहेज के दर्द की दास्तां मदुरई की होनहार लेक्चरर निशाना से होते हुए पंजाब की परमजीत कौर तक पहुंची। हर कहानी निरंतर बहते आंसुओं की स्याही से लिखी हुई लगी। क्या दोष था उन नितांत मासूमों कलियों का? सिर्फ यही ना कि पढ़-लिख कर एक अच्छा जीवनसाथी पाना चाहा, या फिर यह कि वह घर में एक लड़की बनकर जन्मीं? क्या उन्हें हक नहीं था एक खूबसूरत जिंदगी को जीने का?

मानवता की गिरावट का ग्राफ रसातल में जा रहा है और हम वि‍वश से खड़े हैं लेकिन नहीं 'सत्यमेव जयते' आशा की एक सुनहरी किरण के साथ हमें उजली मुस्कान भी देता है। एक किरण जिसकी रोशनी में परिवर्तन की चमक है। बदलाव की इस सुहानी बयार का नाम है 'तंजीमखुद्दामेमिल्लत'। यह है बुरहानपुर के श्री उम्मेदी की अनूठी पहल-नो बैंड, नो बाजा, नो बारात। यानी सादगी से शादी। भिवंडी के अख्तर काजमी, शहनाज और सुफिया ने इसी पहल की तर्ज पर मुंबई में भी सादगी से शादी करवाने का बीड़ा उठाया। इस मुहिम के आदर्श हैं समाज में जहां भी शादी में फालतु खर्च होगा वहां शामिल नहीं होंगे, अ गर शामिल होना भी पड़ा तो खाना नहीं खाएंगे। इस मुहिम का खासा असर हुआ है।

इस उजास के साथ ही 'सत्यमेव जयते' मिलवाता है दहेज के लिए जलती हुई बेटियों के बीच से आई एक साहसी बिटिया रानी त्रिपाठी से। रानी ने दहेज लोभियों का स्टिंग ऑपरेशन करवाया और अंतत: पवन त्रिपाठी के रूप में एक सही जीवनसाथी पाया।

दहेज के खिलाफ सत्यमेव जयते का यह एपिसोड इतना उम्दा और कसावट भरा था कि पूरे वक्त परिवार स्तब्ध सा टीवी के सामने रहा। क्योंकि हर घर में एक बेटी होती है, मां और बहन होती है। क्योंकि यह दर्द हर दिल में रिसता है। अंत में गीत 'पतवार बनूंगी, लहरों से लड़ूंगी' के आह्वान के बाद आमिर के ज्वलंत विचार झकझोरने में सक्षम रहे। 'सत्यमेव जयते' के साथ सोचना हम सबको है क्योंकि दहेज कोई नई समस्या नहीं है, इससे लड़ने के लिए अपनी सोच नई बनानी होगी।

- दामोदर सिंह राजावत
लेखक ई खबर मीडिया के प्रधान संपादक है