रिपोटर- फारीद अहमद
2027 विधानसभा चुनाव में अभी लंबा वक्त है, लेकिन सियासी गलियारों में शह मात का खेल शुरू हो गया है।
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में अपना दल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल की ज्वाइनिंग लोगों का ध्यान खींच रही है।
उसकी कई वजहें भी हैं, पाल समाज प्रदेश में एक बेहद सशक्त मेहनती और शांत समाज है…
आमतौर पर वह राजनीतिक प्रपंचों से दूर अपने कार्यों को प्राथमिकता देने वाला समाज है।
2014 में शुरू हुआ हिंदुत्व का एजेंडा और मोदी लहर पाल बिरादरी की एकजुटता बीजेपी के पाले में नजर आई।
लेकिन अचानक से पाल समाज थोड़ा असहज महसूस कर रहा है।
बीजेपी अपना दल के टिकट पर राजकुमार पाल विधायक चुने गए।
दूसरी बार उनका टिकट काट दिया गया, अपना दल के प्रदेश अध्यक्ष बने, वहां से इस्तीफा देकर अब PDA और पाल समाज की मजबूती के लड़ाई लड़ेगे।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने जनपद में सीटों के एडजस्टमेंट का होगा।
राजकुमार पाल को सपा चुनाव लड़ाएगी, इसकी संभावनाएं अधिक हैं।
अब वह विधानसभा कौन सी होगी इस पर निर्णय तो उन्हें ही करना है।
क्योंकि सपा में पहले से मौजूद कद्दावर नेताओं नागेंद्र सिंह मुन्ना यादव, संजय पांडे, आरके वर्मा जैसे नेता हैं…
सभी को एडजस्ट करना और पार्टी की मजबूती के लिए साथ लेकर भी चलना है..
ऐसे में वह सभी बिन्दुओं और संभावनाओं पर विचार करते हुए आखिरी निर्णय लेगे।
सपा की राजनीतिक सेहत की तंदुरुस्ती के लिए पाल बिरादरी जो औसतन हर विधानसभा में 12 से 15 हजार मतदाताओं के बीच है…
उन्हें अपने पाले में करना चाहेंगे।
सपा अपने PDA की केमेस्ट्री में राजनीतिक हाशिए वाले ओबीसी वोटरों जैसे पाल विश्वकर्मा प्रजापति कुम्हार (भूज) नाई आदि को भी शामिल करना चाहेंगे।
तिनकों तिनकों से अखिलेश यादव PDA के कुनबे को बढ़ाने
की.केमिस्ट्री पर कार्य करते नजर आ रहे हैं…,

