सीतापुर। देश में बैंकिंग व्यवस्था और वित्तीय समावेशन को लेकर एक बार फिर बड़ा मुद्दा सामने आया है। पिछले तीन वर्षों में बैंकों द्वारा ‘न्यूनतम खाता शेष’ (Minimum Balance) बनाए न रखने पर करीब ₹19,000 करोड़ की वसूली किए जाने का मामला चर्चा में है। इस मुद्दे को लेकर संसद में भी आवाज उठाई गई, जहां इसे गरीब और निम्न आय वर्ग के साथ अन्याय बताया गया।
जानकारी के अनुसार, यह वसूली मुख्य रूप से उन खाताधारकों से की गई है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। इनमें किसान, पेंशनभोगी और दिहाड़ी मजदूर शामिल हैं। आरोप है कि जिन लोगों के खाते में पर्याप्त राशि नहीं होती, उन्हीं पर जुर्माने का बोझ डाला जा रहा है, जबकि बड़े कर्जदारों और अमीर वर्ग पर इस तरह का दबाव नहीं दिखता।
मामले को उठाते हुए कहा गया कि एक किसान यदि न्यूनतम बैलेंस नहीं रख पाता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है। इसी तरह, कोई पेंशनभोगी अपनी जरूरत के लिए पैसा निकालता है और बैलेंस कम हो जाता है, तो उसे भी दंड भुगतना पड़ता है। दिहाड़ी मजदूरों के साथ भी यही स्थिति है, जहां कुछ सौ रुपये कम होने पर भी बैंक शुल्क काट लेते हैं।
इस पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा गया कि गरीब लोग अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए बैंक में जमा करते हैं, न कि इस तरह के जुर्मानों का सामना करने के लिए। वित्तीय समावेशन का उद्देश्य छोटे खाताधारकों को राहत देना होना चाहिए, न कि उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना।
संसद में इस मुद्दे पर प्रस्ताव रखते हुए न्यूनतम बैलेंस पर लगने वाले जुर्माने को समाप्त करने की मांग की गई है। प्रस्ताव में कहा गया है कि बैंकिंग सिस्टम को इस तरह के शुल्क को खत्म कर गरीबों को राहत देनी चाहिए, ताकि वे बिना किसी डर के अपनी बचत को बैंक में सुरक्षित रख सकें।
अब देखना होगा कि सरकार और बैंकिंग संस्थान इस मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं और क्या आम लोगों को इस तरह के शुल्क से राहत मिल पाती है या नहीं।
रिपोर्टर: फरीद अहमद
जिला: सीतापुर


