5 साल से आवास और राशन के लिए भटक रहा मजदूर, अब विकलांग पिता की पेंशन भी अटकी; वोट के समय ही याद आती है पंचायत

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टीकमगढ़ जिले के निवाड़ी थाना क्षेत्र अंतर्गत हीरापुर गांव के निवासी मातादीन अहिरवार की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पिछले पांच वर्षों से वे न तो राशन कार्ड बनवा पा रहे हैं और न ही उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल सका है। लगातार पंचायत और अधिकारियों के चक्कर लगाने के बावजूद हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता है।

मातादीन, जिनके पिता का नाम नारायण दास है, वर्तमान में रोजी-रोटी के लिए फरीदाबाद में मजदूरी करते हैं। उनका कहना है कि गांव में रोजगार के अभाव के कारण उन्हें बाहर रहना पड़ता है, लेकिन इसके चलते उन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। वे बताते हैं कि ग्राम प्रधान संतोष यादव से कई बार संपर्क करने पर भी हर बार यही जवाब मिलता है कि “अभी फॉर्म नहीं भरे जा रहे हैं, जब भरेंगे तब आवेदन कर देना।”

मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मातादीन ने बताया कि उनके पिता नारायण दास वर्ष 2013 से विकलांग हैं, लेकिन आज तक उन्हें विकलांगता पेंशन का लाभ नहीं मिल पाया है। पेंशन की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति और अधिक दयनीय हो गई है। उन्होंने कई बार संबंधित विभागों में प्रयास किया, लेकिन हर बार कोई न कोई अड़चन बताकर काम टाल दिया जाता है।

मातादीन ने इस संबंध में 181 हेल्पलाइन पर भी शिकायत दर्ज कराई, लेकिन वहां से भी उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि वे गांव में स्थायी रूप से नहीं रहते, इसलिए उनका काम नहीं हो पा रहा है। इस पर उनका सवाल है कि जब चुनाव के समय वोट डालने के लिए उन्हें गांव बुलाया जाता है, तो फिर योजनाओं का लाभ देने में यह भेदभाव क्यों किया जाता है?

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गांव में कई ऐसे लोगों को आवास योजना का लाभ मिल चुका है, जिनके पहले से पक्के मकान हैं। “उनके घरों के फोटो खींचकर पैसे निकाल लिए जाते हैं, लेकिन हमारा आवेदन ही आगे नहीं बढ़ता,” मातादीन ने कहा। वे अपने गांव में घर बनाना चाहते हैं, लेकिन सरकारी सहायता के अभाव में उनका सपना अधूरा है।

यह पूरा मामला न केवल प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि आखिर कब तक जरूरतमंद लोग अपने अधिकारों के लिए भटकते रहेंगे। एक तरफ सरकार योजनाओं के व्यापक प्रचार का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

 

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