राजधानी दिल्ली में कथित मेडिकल लापरवाही से एक महिला की मौत का मामला अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस मामले ने न केवल न्याय व्यवस्था का ध्यान अपनी ओर खींचा है, बल्कि एक ऐसे परिवार का दर्द भी सामने रखा है जिसकी बहू की मौत के बाद जन्मी मासूम बच्ची अपनी मां के स्नेह से हमेशा के लिए वंचित हो गई। अब उस बच्ची की परवरिश उसके दादा-दादी कर रहे हैं, जिन्होंने सरकार और न्यायालय से निष्पक्ष जांच तथा जल्द न्याय की अपील की है।
याचिकाकर्ता नवीन कांत गिरि ने दिल्ली हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर कर दिल्ली सरकार, राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल, दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल तथा दिल्ली मेडिकल काउंसिल को पक्षकार बनाया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि गंभीर चिकित्सा लापरवाही के कारण महिला की जान चली गई, जिससे उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और एक नवजात बच्ची जन्म लेते ही अपनी मां को खो बैठी।
परिवार का कहना है कि यदि समय पर उचित इलाज और आवश्यक चिकित्सकीय सावधानी बरती जाती तो महिला की जान बचाई जा सकती थी। उनका आरोप है कि अस्पतालों की कथित लापरवाही ने एक खुशहाल परिवार को हमेशा के लिए बिखेर दिया। आज उस मासूम बच्ची की देखभाल उसके दादा-दादी कर रहे हैं, जो अपनी बहू को न्याय दिलाने और अपनी पोती के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि पूरे मामले की किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराई जाए, पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए तथा यदि चिकित्सा लापरवाही सिद्ध होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित लोगों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मामले की सुनवाई 24 फरवरी 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। दिल्ली सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने नोटिस स्वीकार करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 6 मई 2026 के लिए निर्धारित कर दी।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता वर्ष 2024 से इस मामले में लगातार विभिन्न सरकारी विभागों और अस्पतालों से सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते रहे। राव तुलाराम मेमोरियल अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से आरटीआई के माध्यम से जवाब प्राप्त किए गए। इसके बाद प्रथम अपील भी दायर की गई।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली मेडिकल काउंसिल और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई। इसके अतिरिक्त पुलिस अधिकारियों, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग तथा अन्य संबंधित संस्थाओं को भी शिकायतें भेजी गईं। इन शिकायतों, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों, कानूनी नोटिसों और अन्य अभिलेखों को याचिका के साथ संलग्न किया गया है।
याचिकाकर्ता का दावा है कि उपलब्ध दस्तावेज कथित चिकित्सा लापरवाही की ओर संकेत करते हैं और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच आवश्यक है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने अभी तक मामले के तथ्यों और आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी या निष्कर्ष नहीं दिया है। फिलहाल अदालत ने केवल संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। मामले के सभी पहलुओं पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाएगा।
इस बीच पीड़ित परिवार की सबसे बड़ी चिंता उस मासूम बच्ची का भविष्य है, जिसने जन्म लेते ही अपनी मां को खो दिया। दादा-दादी का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल मुआवजे के लिए नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।
अब सभी की निगाहें इस मामले की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के समक्ष जब सभी प्रतिवादी अपना पक्ष रखेंगे, तब यह तय होगा कि स्वतंत्र जांच, मुआवजा या अन्य राहत को लेकर आगे क्या आदेश दिए जाते हैं।

