मध्य प्रदेश के शहडोल और उमरिया जिलों की सीमा पर बहने वाली सोन नदी आज भी विकास से कोसों दूर है। गऊघाट क्षेत्र में पुल न होने की वजह से यह नदी अब तक 211 से ज्यादा लोगों की जान ले चुकी है, लेकिन इसके बावजूद न राज्य सरकार जागी और न ही केंद्र सरकार ने कोई ठोस कदम उठाया। हालात यह हैं कि आज भी ग्रामीण जान जोखिम में डालकर नाव से नदी पार करने को मजबूर हैं।
ग्राम अकुरी पेएली और ग्राम अंकुरी (शहडोल जिला) से ग्राम पैठी (उमरिया जिला) को जोड़ने वाला गऊघाट मार्ग हजारों ग्रामीणों, छात्रों और आदिवासी परिवारों की जीवनरेखा है। पुल न होने के कारण ग्रामीणों को रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए सोन नदी पार करनी पड़ती है। बरसात के मौसम में हालात और भयावह हो जाते हैं, जब तेज बहाव के बीच नाव ही एकमात्र सहारा बनती है।
ग्रामीणों का कहना है कि बीते कई वर्षों में गऊघाट पर दर्जनों बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। 2 अक्टूबर 2025 को दुर्गा विसर्जन के दौरान एक बार फिर बड़ा हादसा होते-होते बचा, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई। छात्र-छात्राओं का स्कूल जाना, मरीजों का अस्पताल पहुंचना और महिलाओं का आना-जाना हर समय खतरे में रहता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर समस्या को लेकर ग्रामीण कई बार प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सरकार को अवगत करा चुके हैं। पंचायत स्तर से लेकर जिला प्रशासन, सांसद, विधायक और मुख्यमंत्री कार्यालय तक ज्ञापन सौंपे गए। केंद्र सरकार को भी आवेदन भेजे गए, लेकिन आज दिन तक गऊघाट सोन नदी पुल निर्माण को कोई स्वीकृति नहीं मिली। ग्रामीणों का आरोप है कि जहां कम जरूरत वाले क्षेत्रों में पुलों की घोषणाएं कर दी जाती हैं, वहीं गऊघाट जैसे संवेदनशील इलाके को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
यह पूरा क्षेत्र आदिवासी बहुल है, जहां पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाओं का अभाव है। पुल न होने से विकास पूरी तरह ठप पड़ा है। बारिश के दिनों में कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि हजारों जिंदगियों की सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्र सरकार से मांग की है कि गऊघाट सोन नदी पर पुल निर्माण को तत्काल मंजूरी दी जाए और अंबरी से पैठी तक सड़क को डामरीकृत कर मुख्य मार्ग घोषित किया जाए। उनका कहना है कि अगर अब भी सरकार ने आंखें मूंदे रखीं, तो भविष्य में होने वाली हर अनहोनी की जिम्मेदारी सिस्टम की होगी।
अब सवाल यह है कि 211 हादसों के बाद भी क्या सरकार जागेगी, या फिर सोन नदी यूं ही आदिवासी अंचल की कब्रगाह बनी रहेगी।

