मोहन भागवत ने कहा कि संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा, तो राष्ट्रवासी भी सशक्त होंगे। साथ ही उन्होंने का कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज दुनिया भारत को फिर से नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रही है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में “100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज, नए आयाम” विषय पर आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी और संवाद कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने मार्गदर्शन से सभा को संबोधित किया। यह कार्यक्रम देहरादून के हिमालयन कल्चरल सेंटर में आयोजित हुआ, जिसमें कई सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।डॉ. मोहन भागवत ने संघ के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा, तो राष्ट्रवासी भी सशक्त होंगे। यदि राष्ट्र दुर्बल होगा, तो व्यक्ति अपने ही देश में सुरक्षित नहीं रह पाएगा। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है।
भारत की नेतृत्वकारी भूमिका
उन्होंने आगे कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज दुनिया भारत को फिर से नेतृत्वकारी भूमिका में देखने की आशा कर रही है। संघ के सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने में भाग लें। उन्होंने “पंच परिवर्तन” सिद्धांतों के बारे में बताया और भारत को परम वैभव तक पहुंचाने का संकल्प लेने का आग्रह किया।
मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को पीटने से नहीं, प्रकाश जलाने से समाप्त किया जाता है। व्यवहार में परिवर्तन से ही भेदभाव मिटेगा। संघ में कई स्वयंसेवक दशकों तक कार्य करते हैं, पर पहचान की अपेक्षा नहीं रखते, क्योंकि कार्य ही प्रधान है।
“तकनीक साधन है, साध्य नहीं”
डिजिटल युग पर उन्होंने कहा कि तकनीक साधन है, साध्य नहीं। उसका उपयोग संयम और अनुशासन से होना चाहिए। परिवार में आत्मीयता और समय देना आवश्यक है; तकनीक के लिए मनुष्य की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती। उन्होंने कहा कि जो जोड़ने का कार्य करे, वही हिंदू है। मातृभूमि के प्रति भक्ति अनिवार्य है। विश्व सत्य से अधिक शक्ति को समझता है, इसलिए शक्ति अर्जित करना आवश्यक है, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।
संघ प्रमुख ने कहा कि महिलाएं पूर्णतः स्वतंत्र हैं। देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए। प्रतिबंध काल में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को उन्होंने बोझ और संसाधन– दोनों दृष्टियों से देखने की आवश्यकता बताई और समान रूप से लागू होने वाली विचारपूर्ण नीति पर बल दिया।

