कानपुर नगर में जमीन विवाद का हाईकोर्ट तक सफर, एफआईआर रद्द करने से इनकार, पुलिस जांच में निकला राजस्व विवाद

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कानपुर नगर।
जमीन के एक पुराने विवाद ने कानपुर नगर में ऐसा तूल पकड़ा कि मामला थाने से निकलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अलग–अलग याचिकाओं, एफआईआर, आईजीआरएस शिकायत और पुलिस जांच के बाद पूरा मामला एक बार फिर राजस्व न्यायालय के पाले में जाता दिखाई दे रहा है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि गंभीर आरोपों वाली एफआईआर को शुरुआती स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता, जबकि स्थानीय पुलिस जांच में इसे दीवानी/राजस्व विवाद मानते हुए आपराधिक कार्रवाई की जरूरत से इनकार किया गया है।

एफआईआर रद्द करने की मांग पर हाईकोर्ट की सख्ती

इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा शामिल थे, ने क्रिमिनल मिस. रिट पिटीशन संख्या 6198/2022 में दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में 12 अक्टूबर 2021 को दर्ज एफआईआर (केस क्राइम संख्या 0333/2021) को रद्द करने की मांग की गई थी।
एफआईआर में आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471, 504 और 506 जैसे गंभीर आरोप दर्ज थे। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे खुद धोखाधड़ी का शिकार हुए हैं और किसी ने जमीन के असली मालिक का रूप धारण कर फर्जी तरीके से एग्रीमेंट टू सेल कराया।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलें उनका बचाव हैं, जिनकी सत्यता जांच के दौरान तय होगी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एफआईआर में संज्ञेय अपराध बनते हैं और इस स्तर पर जांच रोकना या एफआईआर रद्द करना पूरी तरह गलत होगा। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को जमानत या अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने की छूट जरूर दी।

अनुच्छेद 227 की याचिका, नोटिस जारी

इसी सिलसिले में एक अन्य मामला मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 संख्या 10199/2022 के रूप में सामने आया, जिसमें सुधीर सिंह ने राज्य सरकार सहित अन्य के खिलाफ याचिका दायर की। न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह विपक्षी पक्षों को नोटिस जारी कराने की प्रक्रिया पूरी करे। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी 2023 को तय की गई।

आईजीआरएस शिकायत और पुलिस जांच का बड़ा खुलासा

इस पूरे विवाद का एक और अहम पहलू आईजीआरएस शिकायत के जरिए सामने आया। सुधीर सिंह निवासी ग्राम कुल्हौली, थाना बिधनू, कानपुर नगर ने आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई थी। जांच उपनिरीक्षक सौरभ कुमार ने 13 दिसंबर को मौके पर जाकर जांच की।

पुलिस रिपोर्ट में चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया। जांच में पाया गया कि शिकायतकर्ता और उसके पड़ोसी राजेंद्र पुत्र जगवंत सिंह के बीच लंबे समय से जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। खुद शिकायतकर्ता ने पुलिस को बताया कि उसके वकील के अनुसार यह मामला राजस्व विभाग या न्यायालय से जुड़ा है और इसका निस्तारण वहीं से होना चाहिए।

सबसे अहम बात यह रही कि शिकायतकर्ता ने लिखित रूप में पुलिस कार्रवाई न चाहने की बात कही। इसके बाद पुलिस ने रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा कि किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।

कानूनी पेच में उलझा जमीन विवाद

एक तरफ हाईकोर्ट ने गंभीर धाराओं वाली एफआईआर को जांच योग्य मानते हुए रद्द करने से इनकार कर दिया, वहीं दूसरी ओर स्थानीय पुलिस जांच में इसे शुद्ध रूप से राजस्व विवाद मान लिया गया। ऐसे में यह मामला कानून के कई मोर्चों पर उलझता नजर आ रहा है।

जानकारों की मानें तो जमीन विवादों में आपराधिक धाराएं जोड़ने और फिर राजस्व विवाद बताकर पीछे हटने का यह चलन लगातार बढ़ रहा है। इससे न सिर्फ न्याय व्यवस्था पर दबाव पड़ता है, बल्कि असली पीड़ित को भी वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

अब आगे क्या?

फिलहाल यह मामला राजस्व न्यायालय और आपराधिक जांच के बीच झूलता हुआ दिख रहा है। हाईकोर्ट के रुख के बाद एफआईआर पर जांच जारी रह सकती है, जबकि पुलिस की रिपोर्ट दीवानी विवाद की ओर इशारा कर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जांच एजेंसियां और अदालतें इस पेचीदा जमीन विवाद को किस दिशा में ले जाती हैं।

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