सरकारी रास्ते पर कब्जे का आरोप, जातीय एक्ट की धमकी—लखीमपुर खीरी में शिवानी का परिवार घर में कैद होने को मजबूर

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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के थाना भीरा क्षेत्र अंतर्गत रामनगर खुर्द गांव से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां सरकारी रास्ते को लेकर चल रहा विवाद अब खुली धमकियों, उत्पीड़न और जातीय दबाव में बदल गया है। पीड़िता शिवानी, पत्नी दीपू, का आरोप है कि बीते चार-पांच वर्षों से वह और उनका परिवार अपने ही घर से बाहर निकलने में डर महसूस कर रहा है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

मामला रामनगर खुर्द गांव का है, जहां पूर्व में दोनों पक्षों के बीच रास्ते को लेकर विवाद हुआ था। इस विवाद को लेकर गांव स्तर पर सुलह-समझौता भी कराया गया था। सुलहनामे में स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि सार्वजनिक रास्ता सभी के लिए खुला रहेगा और किसी भी पक्ष द्वारा उसमें बाधा नहीं डाली जाएगी। सुलहनामा दोनों पक्षों की सहमति से, बिना किसी दबाव के लिखा-पढ़ा गया और मान्य किया गया था।
इसके बावजूद शिवानी का आरोप है कि आरोपी सालिक राम, और जयपाल सुलहनामे और कानून दोनों को ठेंगा दिखा रहे हैं। वे सरकारी रास्ते पर न तो आने-जाने देते हैं और न ही वहां कोई सामान रखने देते हैं। शिवानी का कहना है कि यदि वह रास्ते में कुछ भी रख देती हैं, तो आरोपी उस पर कुत्तों की गंदगी फेंक देते हैं या जानबूझकर अपमानजनक हरकतें करते हैं।

पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी खुलेआम धमकी देते हैं कि वे “हरिजन एक्ट” लगा देंगे और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। शिवानी के अनुसार, आरोपी यह तक कहते हैं कि वे सरकारी रास्ते पर दीवार खड़ी कर देंगे और प्रशासन भी उनका कुछ नहीं कर पाएगा। इन धमकियों के कारण पूरा परिवार मानसिक तनाव में जी रहा है।
शिवानी का कहना है कि वह इस मामले को लेकर कई बार शिकायत और आवेदन दे चुकी हैं, लेकिन न तो स्थानीय प्रधान ने कोई मदद की और न ही प्रशासन स्तर पर सुनवाई हुई। उनका आरोप है कि दबंगई और जातीय धमकियों के चलते उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

पीड़िता ने बताया कि हालात इतने खराब हो चुके हैं कि घर के बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। बच्चों और महिलाओं में भय का माहौल है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि रास्ते को तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराया जाए, आरोपियों पर सख्त कार्रवाई हो और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि जब लिखित सुलहनामा और सरकारी रास्ते का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है, तो फिर पीड़ित परिवार वर्षों से न्याय के लिए क्यों भटक रहा है। शिवानी का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो किसी बड़ी अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता।

 

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