90 साल पुराने पट्टे और कब्जे का दावा, वन विभाग पर मकान व खेती छीनने का आरोप; तीन वर्षों से न्याय की आस में भटक रहे ग्रामीण

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महराजगंज (उत्तर प्रदेश)। महराजगंज जिले की फरेन्दा तहसील अंतर्गत ग्राम बरडाड़, टोला विशुनचक के केवट समाज के कई परिवारों ने वन विभाग पर वर्षों पुराने कब्जे वाली जमीन से बेदखल करने, खेती करने से रोकने तथा मकान और मंदिरों को ध्वस्त करने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उनके पूर्वजों को वर्ष 1937 में तत्कालीन अंग्रेजी शासन के दौरान उक्त भूमि का पट्टा प्रदान किया गया था। आजादी के बाद भी उनके परिवार लगातार उसी भूमि पर निवास करते रहे, खेती-बाड़ी करते रहे और वहीं उनके कच्चे-पक्के मकान तथा धार्मिक स्थल भी बने हुए हैं, लेकिन अब वन विभाग उस भूमि पर अपना अधिकार जताते हुए उन्हें हटाने का दबाव बना रहा है।

पीड़ित परिवारों के अनुसार उनके पूर्वज कम पढ़े-लिखे होने के कारण आजादी के बाद भूमि का राजस्व अभिलेखों में अपने नाम दर्ज नहीं करा सके। बाद में संबंधित भूमि वन विभाग के नाम दर्ज हो गई। उनका दावा है कि लगभग एक शताब्दी से उनका वास्तविक कब्जा लगातार बना हुआ है और इसके समर्थन में वर्ष 1937 के पट्टे सहित अन्य दस्तावेज भी उनके पास उपलब्ध हैं। उनका आरोप है कि इसके बावजूद वन विभाग उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है और उन्हें लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि विवादित भूमि पर उनके मकान, खेती और धार्मिक स्थल वर्षों से मौजूद हैं। उनका आरोप है कि वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा उन्हें खेती करने से रोका जाता है, फसलें नष्ट की जाती हैं, मकान खाली कराने और बुलडोजर से ध्वस्त करने की धमकी दी जाती है। इतना ही नहीं, पीड़ितों का यह भी आरोप है कि विरोध करने पर उनके विरुद्ध फर्जी मुकदमे दर्ज कराए गए तथा अपमानजनक व्यवहार और गाली-गलौज भी की गई, जिससे पूरा परिवार मानसिक तनाव में जीवन जीने को मजबूर है।

मामले को लेकर पीड़ित परिवारों ने मुख्यमंत्री कार्यालय, आईजीआरएस पोर्टल, जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक सहित विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार शिकायतें भेजीं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उपजिलाधिकारी फरेन्दा की जांच रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि संबंधित भूमि वर्तमान में अभिलेखों में वन विभाग के नाम दर्ज है, जबकि कुछ हिस्से पर आवेदक परिवारों के मकान बने हुए हैं और कुछ भूमि पर खेती की जा रही है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इसी भूमि से संबंधित रिट याचिका संख्या Writ-C 33497/2022 इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय के बाद ही आगे की कार्रवाई उचित होगी।

पीड़ितों का कहना है कि न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उनका आरोप है कि पिछले लगभग तीन वर्षों से वे विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें स्थायी राहत नहीं मिली। परिवारों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने निष्पक्ष जांच कर उचित कार्रवाई नहीं की तो उनके सामने आजीविका और आशियाना दोनों का संकट खड़ा हो जाएगा।

ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राजस्व विभाग तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं जमीनी स्तर पर जांच कराई जाए, वर्ष 1937 के पट्टे एवं उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण किया जाए, न्यायालय में लंबित मामले का सम्मान करते हुए उन्हें अनावश्यक उत्पीड़न से राहत दी जाए तथा अंतिम निर्णय तक उनके मकान, खेती और जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें केवल निष्पक्ष न्याय और अपने अधिकारों की कानूनी सुरक्षा चाहिए, ताकि वे वर्षों से बसे अपने घरों में सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें

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