दुखद। चिंताजनक। शर्मनाक।
जिला जेल सिंगरौली में बंद एक और कैदी की मौत ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। इस कैदी को गंभीर हालत में ट्रामा सेंटर अस्पताल लाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इसी जेल में तीन कैदियों की मौत हो चुकी है। लगातार हो रही ये मौतें अब एक सामान्य खबर नहीं रहीं, बल्कि पूरे जेल प्रशासन पर गंभीर सवाल बनकर खड़ी हो गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर जिला जेल में क्या हो रहा है?
क्या कैदियों की तबीयत अचानक इतनी बिगड़ जाती है कि उन्हें बचाने का मौका तक नहीं मिलता?
या फिर इलाज में देरी, लापरवाही और अनदेखी की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है?
जेल प्रशासन दावा करता है कि कैदियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है, लेकिन हकीकत इन दावों को बार-बार झूठा साबित कर रही है। अगर व्यवस्थाएं दुरुस्त होतीं, तो एक के बाद एक कैदी की मौत कैसे हो सकती थी?
अब सवाल सीधे तौर पर जेलर त्रिपाठी और जेल प्रशासन पर उठता है।
आख़िर वे क्या चाहते हैं?
क्या तब तक चुप्पी बनी रहेगी जब तक अगली मौत न हो जाए?
क्या कैदियों की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं है?
जेल में बंद व्यक्ति अपराधी हो सकता है, लेकिन वह इंसान भी है। कानून ने उसे सज़ा दी है, मौत नहीं। उसकी सुरक्षा और इलाज की जिम्मेदारी पूरी तरह जेल प्रशासन की होती है। बार-बार हो रही मौतें यह साबित करती हैं कि कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही, संवेदनहीनता और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति हावी है।
यह सिर्फ एक कैदी की मौत नहीं है।
यह उस सिस्टम की मौत है जो काग़ज़ों में तो नियमों का पालन करता है, लेकिन ज़मीन पर इंसानों की जान से समझौता करता है।
यह उस व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ जवाबदेही तय करने से पहले फाइलें बंद कर दी जाती हैं।
अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित कर कड़ी कार्रवाई हो।
और यह सुनिश्चित किया जाए कि आगे किसी और कैदी को ऐसी कीमत न चुकानी पड़े।
अगर अब भी चुप्पी साधी गई, तो यह चुप्पी भी अपराध मानी जाएगी।
दुखद।
चिंताजनक।
शर्मनाक।

