दवा के रिएक्शन ने छीनी चलने की ताकत, अब सिस्टम की अनदेखी से टूटी उम्मीदें: जौनपुर के विकलांग मोहम्मद शरीफ को साइकिल भी नहीं मिली

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जौनपुर।
जिले के केराकत विकास खंड अंतर्गत लोभी क्षेत्र के ग्राम हिसामपुर में रहने वाले 60 वर्षीय मोहम्मद शरीफ उमर की कहानी सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। कुछ वर्ष पहले तक पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे मोहम्मद शरीफ आज कमर से नीचे पूरी तरह विकलांग हैं। बताया जाता है कि इलाज के दौरान ली गई दवाइयों के गंभीर रिएक्शन के कारण उनकी यह स्थिति हो गई, जिससे उनकी पूरी जिंदगी बदल गई।

विकलांगता के बाद मोहम्मद शरीफ की सबसे बड़ी समस्या आवागमन बन गई। इलाज, दवा, सरकारी दफ्तर या रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी परेशानी को देखते हुए उन्होंने शासन द्वारा संचालित विकलांग सहायता योजना के तहत साइकिल प्राप्त करने के लिए निर्धारित कैंप में ऑनलाइन आवेदन किया। आवेदन के बाद उन्हें रसीद भी दी गई और यह भरोसा दिलाया गया कि साइकिल उपलब्ध होते ही उन्हें प्रदान कर दी जाएगी।

लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी मोहम्मद शरीफ को साइकिल नहीं मिली। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि बाद में उन्हें जानकारी मिली कि जिस साइकिल के लिए उन्होंने आवेदन किया था, वह उनके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को दे दी गई। एक जरूरतमंद विकलांग बुजुर्ग के साथ हुई इस कथित अनदेखी ने स्थानीय लोगों में भी नाराजगी पैदा कर दी है।

मोहम्मद शरीफ ने इस संबंध में जिलाधिकारी जौनपुर को प्रार्थना पत्र देकर न्याय की गुहार लगाई है। अपने पत्र में उन्होंने साफ लिखा है कि वह एक गरीब और विकलांग व्यक्ति हैं, उन्हें साइकिल की अत्यधिक आवश्यकता है, लेकिन बार-बार आवेदन और प्रयास के बावजूद उन्हें योजना का लाभ नहीं दिया गया। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि उनके मामले की निष्पक्ष जांच कराकर उन्हें नियमानुसार साइकिल उपलब्ध कराई जाए।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सरकार विकलांगों के लिए कई योजनाओं का प्रचार करती है, लेकिन जब वास्तविक जरूरतमंद सामने आता है तो उसे दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। मोहम्मद शरीफ की उम्र बढ़ रही है, बीमारी बढ़ रही है, लेकिन सरकारी फाइलें आगे नहीं बढ़ रहीं।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उन तमाम विकलांग और गरीब लोगों की आवाज है, जो योजनाओं के कागजी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पिस रहे हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है और क्या मोहम्मद शरीफ को उनका हक मिल पाता है या नहीं।

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