करौली। करौली जिले के सैमरदा गांव निवासी लक्खी पुत्र सूका का जमीन विवाद वर्षों बाद भी खत्म नहीं हुआ है। खसरा नंबर 155 की करीब 2 बीघा 17 बिस्वा जमीन को लेकर चल रहे विवाद में पीड़ित पक्ष का आरोप है कि उसे खेत जोतने-बोने नहीं दिया जाता और विरोध करने पर धमकियां दी जाती हैं। पीड़ित परिवार का कहना है कि न्यायालय से आदेश मिलने के बावजूद जमीन पर अपने अधिकार का उपयोग करने में परेशानी हो रही है और परिवार लगातार तनाव में जीवन गुजार रहा है।
उपलब्ध न्यायालयीन दस्तावेजों के अनुसार विवादित जमीन ग्राम गैरई की गुआड़ी, पटवार हल्का गैरई, तहसील एवं जिला करौली में स्थित बताई गई है। लक्खी ने जिला कलेक्टर, जिला पुलिस अधीक्षक और उपखंड मजिस्ट्रेट को दिए अलग-अलग आवेदनों में न्यायालय के आदेशों की पालना कराने की मांग की है। आवेदन में कहा गया है कि संबंधित जमीन पर दूसरे पक्ष के लोग कथित रूप से लाठी के बल पर उन्हें खेती करने से रोकते हैं।
लक्खी के अनुसार इस जमीन को लेकर उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण न्यायालय, करौली में मामला उठाया था। दस्तावेज में 18 जनवरी 2021 के न्यायालयीन आदेश का उल्लेख है, जिसमें जिला कलेक्टर करौली और जिला पुलिस अधीक्षक करौली को पीड़ित के साम्पत्तिक अधिकारों तथा शारीरिक संरक्षण के लिए उचित उपाय करने और न्यायालय को सूचित करने के निर्देश दिए गए थे।
पीड़ित का कहना है कि इसके बावजूद जमीन पर स्थिति सामान्य नहीं हुई। इसी कारण 28 मई 2025 को भी न्यायालय की ओर से कलेक्टर और एसपी को आदेश जारी किए जाने का उल्लेख आवेदन में किया गया है। अब 4 जुलाई 2026 को लक्खी ने फिर प्रशासन के सामने आवेदन देकर मांग की है कि न्यायालय के आदेशों की पालना कराते हुए उनकी जमीन पर जुताई-बुवाई प्रशासन की निगरानी में कराई जाए।
लक्खी ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि बदन सिंह सहित अन्य लोग उन्हें खेत में जाने और खेती करने से रोकते हैं। उनका कहना है कि जमीन पर अपना अधिकार होने के बावजूद वह खेती नहीं कर पा रहे हैं। पीड़ित परिवार ने यह भी आरोप लगाया है कि विवाद के दौरान उन्हें और परिवार के सदस्यों को सुरक्षा को लेकर डर बना रहता है।
मामले की न्यायालयीन कार्यवाही में पुराने मुकदमे का भी उल्लेख सामने आया है। दस्तावेज के अनुसार विवादित जमीन को लेकर एफआईआर संख्या 448/19 दर्ज कराई गई थी। पुलिस अनुसंधान के बाद मामले में एफआर प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है, जिसके बाद परिवादी की ओर से प्रोटेस्ट पिटीशन पेश की गई।
न्यायालयीन रिकॉर्ड में दूसरे पक्ष की ओर से विवादित जमीन पर लंबे समय से उनके कब्जे का दावा किया गया है। उनके अधिवक्ता ने न्यायालय में तर्क दिया कि जमीन का विवाद मूल रूप से राजस्व और सिविल प्रकृति का है तथा संबंधित जमीन को लेकर राजस्व न्यायालय में भी मामला विचाराधीन है। दूसरे पक्ष ने पुराने राजस्व एवं सिविल मामलों का हवाला देते हुए लक्खी के दावे का विरोध किया है।
यानी इस मामले में दोनों पक्ष जमीन पर अपने-अपने अधिकार और कब्जे का दावा कर रहे हैं। एक पक्ष न्यायालय के संरक्षण आदेशों के आधार पर जमीन पर अपने साम्पत्तिक अधिकार और सुरक्षा की मांग कर रहा है, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि जमीन पर उनका पुराना कब्जा चला आ रहा है और विवाद राजस्व न्यायालय में विचाराधीन है।
न्यायालयीन आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि वर्ष 2022 में सरसों की फसल कटाई से संबंधित आवेदन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उस समय की परिस्थितियों के कारण उस फसल की कटाई का आदेश देना संभव नहीं माना गया। हालांकि न्यायालय ने 18 जनवरी 2021 के आदेश को अलग से समाप्त किए जाने का कोई आधार नहीं पाया और उसकी अनुपालना सुनिश्चित करने के संबंध में जिला कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए जाने को उचित माना।
दस्तावेज के अनुसार न्यायालय ने जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक करौली को पीड़ित के साम्पत्तिक और शारीरिक संरक्षण से संबंधित पहले के आदेश की अनुपालना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। यही आदेश अब पीड़ित पक्ष द्वारा प्रशासन के सामने रखकर खेत की जुताई-बुवाई कराने और सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की जा रही है।
लक्खी का कहना है कि मामला वर्षों से न्यायालय और प्रशासन के स्तर पर चल रहा है, लेकिन जमीन को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ। उनका परिवार मानसिक दबाव में है और उन्हें आशंका रहती है कि खेत पर जाने के दौरान उनके साथ कोई अप्रिय घटना हो सकती है। उनका कहना है कि वह कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहते, बल्कि न्यायालय के आदेश के अनुसार प्रशासन की मौजूदगी में अपनी जमीन पर खेती करना चाहते हैं।
पीड़ित परिवार ने जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि न्यायालय के आदेशों की प्रभावी पालना कराई जाए। साथ ही खेत की जुताई-बुवाई के दौरान पर्याप्त पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए, ताकि दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार का विवाद या हिंसक स्थिति पैदा न हो।
मामले में अब प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। एक ओर न्यायालय के आदेशों की पालना सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी ओर जमीन के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े लंबित राजस्व विवाद का भी सम्मान करना है। ऐसे में दोनों पक्षों के दस्तावेज और न्यायालयीन आदेशों के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई ही विवाद को आगे बढ़ने से रोक सकती है।
लक्खी और उनका परिवार अब प्रशासन से समय रहते हस्तक्षेप की उम्मीद लगाए बैठा है। उनका कहना है कि उन्हें वर्षों से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और न्यायालय से आदेश मिलने के बावजूद यदि जमीन पर खेती करने और सुरक्षा का अधिकार व्यवहारिक रूप से नहीं मिल पाया तो उनके लिए स्थिति बेहद कठिन हो जाएगी। परिवार ने मांग की है कि संबंधित अधिकारी मौके की स्थिति की जांच कर न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप तत्काल आवश्यक कदम उठाएं।

