‘प्रेम कीटाणु’ दोस्ती, प्यार और करियर की उलझनों से गुजरती युवा कहानी है। सहज अभिनय, हास्य और प्यारे रिश्ते फिल्म को आकर्षक बनाते हैं, लेकिन कमजोर दूसरा भाग और अनुमानित कहानी इसका असर सीमित कर देती है।
कुछ फिल्में जिंदगी के बड़े सवालों के जवाब देने नहीं आतीं। वे बस आपके साथ कुछ वक्त बिताती हैं, आपकी उलझनों पर मुस्कुराती हैं, दोस्तों के साथ बिताए बेवकूफी भरे पलों की याद दिलाती हैं और जाते-जाते चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान छोड़ जाती हैं। ‘प्रेम कीटाणु’ कुछ ऐसी ही फिल्म है। यह प्रेम कहानी जरूर है, लेकिन सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है। इसके केंद्र में वह उम्र है जब पढ़ाई पूरी हो चुकी होती है, करियर की दिशा साफ नहीं होती, रिश्तों की परिभाषा रोज बदलती है और भविष्य को लेकर आत्मविश्वास जितनी तेजी से आता है, उतनी ही तेजी से चला भी जाता है। फिल्म इसी असमंजस को हास्य, दोस्ती और रोमांस के सहारे पकड़ने की कोशिश करती है और शायद इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह अपनी दुनिया को बहुत गंभीर बनाकर पेश नहीं करती।
कहानी
कहानी विशाल ठाकुर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पढ़ाई पूरी करने के बाद जिंदगी के उस मोड़ पर खड़ा है जहां डिग्री हाथ में है, लेकिन भविष्य की दिशा साफ नहीं है। नौकरी, परिवार, आत्मनिर्भर बनने की इच्छा और विदेश जाकर आगे पढ़ने के सपने, इन सबके बीच विशाल की जिंदगी पहले ही पर्याप्त उलझी हुई है। इसी बीच उसकी जिंदगी में सुहानी आती है। यहां से कहानी एक ऐसे रोमांटिक सफर की ओर बढ़ती है जिसमें आकर्षण है, गलतफहमियां हैं, उम्मीदें हैं और सबसे बढ़कर दो लोगों की अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं।
फिल्म इस रिश्ते को किसी भारी-भरकम प्रेम-कथा की तरह नहीं देखती। यहां प्यार भी थोड़ा असहज है, नायक भी थोड़ा अपरिपक्व है और परिस्थितियां भी हमेशा उसके पक्ष में नहीं रहतीं। यही बात इसे युवा दर्शकों के करीब लाती है, लेकिन कहानी की परेशानी यह है कि जिस भावनात्मक जमीन पर फिल्म शुरुआत में कदम रखती है, वहां वह ज्यादा देर रुकती नहीं। विशाल की नौकरी और भविष्य को लेकर बेचैनी, परिवार के साथ उसका तनाव और अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश, ये सब दिलचस्प आधार तैयार करते हैं, मगर फिल्म इन पहलुओं को उतनी गहराई तक नहीं ले जाती जितनी क्षमता उनमें दिखाई देती है।
नतीजा यह कि पहला हिस्सा ज्यादा जीवंत और स्वाभाविक लगता है, जबकि आगे बढ़ते-बढ़ते कहानी अपेक्षाकृत परिचित रोमांटिक ढांचे में लौट आती है। दूसरे हिस्से में रोमांटिक संघर्ष कहानी की गति को थोड़ा धीमा करता है और कुछ घटनाओं का अंदाजा पहले ही लगने लगता है।
अभिनय
वीर पहाड़िया, विशाल के किरदार को जरूरत से ज्यादा चमकाने की कोशिश नहीं करते। उनके अभिनय में एक सहजता है, जो किरदार को जमीन से जोड़े रखती है। विशाल कोई आदर्श नायक नहीं है। वह गलतियां करता है, असुरक्षित महसूस करता है, प्यार में जल्दबाजी करता है और कई बार खुद को समझने से पहले सामने वाले को समझने की कोशिश करता है। वीर की सबसे अच्छी बात यही है कि वह इन कमजोरियों को छिपाते नहीं। उनका विशाल किसी बड़े फिल्मी नायक की तरह नहीं, बल्कि आसपास दिखने वाले उस लड़के जैसा लगता है जो जिंदगी को लेकर खुद भी थोड़ा उलझा हुआ है और प्यार को लेकर उससे भी ज्यादा।
आफिया सैयद के लिए यह फिल्म एक महत्वपूर्ण शुरुआत है और वह पर्दे पर सहज दिखाई देती हैं। सुहानी को केवल नायक की प्रेमिका बनाकर नहीं रखा गया है; उसके अपने विचार और रिश्ते को लेकर अपनी अपेक्षाएं हैं। आफिया इन भावनाओं को बहुत जोर देकर नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत नियंत्रित तरीके से सामने लाती हैं। उनकी उपस्थिति फिल्म में ताजगी जोड़ती है।
लेकिन अगर किसी एक अभिनेता को फिल्म की हास्य-ऊर्जा का केंद्र कहा जाए तो वह निखिल विजय हैं। उनका अभिनय उन जगहों पर फिल्म को अतिरिक्त ऊर्जा देता है जहां मुख्य कहानी थोड़ी ढीली पड़ने लगती है। विशाल और उनके बीच की दोस्ती फिल्म के सबसे स्वाभाविक हिस्सों में से एक है। उनकी संवाद अदायगी और हास्य की समझ कई साधारण परिस्थितियों को भी मजेदार बना देती है।
अपरशक्ति खुराना भी अपने परिचित हास्य अंदाज में प्रभाव छोड़ते हैं। उनका किरदार कहानी के रोमांटिक तनाव में हल्कापन बनाए रखता है। वहीं राकेश बेदी अपने किरदार में सहज विश्वसनीयता लेकर आते हैं।
निर्देशन
निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी प्रेम-कहानी को ताजा बनाए रखने की थी, जिसकी मूल भावनाएं दर्शकों के लिए परिचित हैं। इस चुनौती से वह काफी हद तक निपट लेते हैं। फिल्म का वातावरण लगातार हल्का रखा गया है और यही इसकी दुनिया को सहज बनाता है। हास्य को जबरन पैदा करने की कोशिश कम दिखाई देती है। कई मजेदार क्षण बातचीत, दोस्ती और रोजमर्रा की परिस्थितियों से निकलते हैं।
फिल्म की एक खासियत यह भी है कि इसके हास्यपूर्ण दृश्य अपने किरदारों से निकलते हैं। संवादों को केवल हंसाने के लिए नहीं लिखा गया, बल्कि किरदारों की आपसी समझ और दोस्ती से हास्य पैदा होता है, लेकिन निर्देशन की सीमा भी यहीं सामने आती है। जिन किरदारों में भावनात्मक संभावनाएं थीं, उन्हें पूरी तरह खोलने के बजाय फिल्म कई बार आसान रास्ता चुनती है। विशाल के करियर और पारिवारिक परेशानियां सिर्फ कहानी का हिस्सा बनकर रह जाती हैं; वे उसके व्यक्तित्व को जितना बदल सकती थीं, उतना नहीं बदलतीं। यही वजह है कि फिल्म मनोरंजन तो देती है, लेकिन लंबे समय तक भीतर नहीं ठहरती।
संवाद और हास्य
‘प्रेम कीटाणु’ की सबसे बड़ी उपलब्धि इसके बातचीत पर आधारित हास्य में है। मजाक केवल चुटकुले या संवादों के रूप में नहीं आता, बल्कि बातचीत के बीच से निकलता है। विशाल और मगन की बातचीत फिल्म को वह युवा ऊर्जा देती है जिसकी जरूरत एक ऐसी कहानी को थी। कई जगह ऐसा महसूस होता है जैसे आप किसी फिल्मी संवाद को नहीं, बल्कि दो दोस्तों की निजी बातचीत सुन रहे हों। यही वह हिस्सा है जहां फिल्म सबसे ज्यादा अपनी पहचान बनाती है।
तकनीकी पक्ष
फिल्म का तकनीकी पक्ष ऐसा नहीं है जिसे देखकर दर्शक अलग से चौंक जाए, लेकिन यह कहानी के माहौल को अच्छी तरह सहारा देता है। सिनेमाई प्रस्तुति अपेक्षाकृत सहज और युवा वातावरण के अनुकूल रहती है। संगीत और पार्श्व संगीत रोमांटिक तथा हल्के-फुल्के माहौल को आगे बढ़ाते हैं। फिल्म की प्रस्तुति में अनावश्यक भारीपन नहीं है, जो इसके विषय और शैली के लिहाज से सही फैसला है। हालांकि लगभग दो घंटे अठारह मिनट की अवधि को देखते हुए संपादन थोड़ा और चुस्त हो सकता था। खासकर दूसरे हिस्से में कुछ दृश्यों को छोटा करने से कहानी की गति बेहतर हो सकती थी।
क्या काम करता है?
सबसे पहले फिल्म का माहौल। यह आपको लगातार यह महसूस कराता है कि आप किसी बहुत बड़ी समस्या से नहीं, बल्कि जिंदगी की छोटी-छोटी परेशानियों से जूझ रहे युवाओं की कहानी देख रहे हैं। नौकरी का तनाव, दोस्ती, प्यार, असुरक्षा और भविष्य को लेकर भ्रम, ये सब मिलकर कहानी को परिचित बनाते हैं।
दूसरा बड़ा पक्ष है कलाकारों की आपसी केमिस्ट्री। खासकर वीर पहाड़िया और निखिल विजय की दोस्ती फिल्म को ऊर्जा देती है। आफिया सैयद की सहजता रोमांटिक हिस्से को ताजगी देती है, जबकि अपरशक्ति खुराना हास्य के माहौल को बनाए रखते हैं।
तीसरा, फिल्म का हास्य। यह फिल्म जब हंसाने की कोशिश करती है, तब कई बार सच में हंसा देती है और चौथा, इसकी हल्की-फुल्की संवेदना। फिल्म जिंदगी की उलझनों को बहुत भारी नहीं बनाती।
क्या काम नहीं करता?
सबसे बड़ी कमी है कि फिल्म कई जगह सुरक्षित रास्ता चुनती है। जिस कहानी में युवा बेरोजगारी, परिवार, आत्मनिर्भरता और रिश्तों की बदलती अपेक्षाओं जैसे विषय मौजूद हैं, वहां और ज्यादा गहराई संभव थी। फिल्म इन मुद्दों को छूती जरूर है, मगर कई बार सिर्फ अगले रोमांटिक या हास्यपूर्ण दृश्य तक पहुंचने के लिए।
दूसरे हिस्से में रोमांटिक संघर्ष भी अपेक्षाकृत अनुमानित महसूस होने लगता है। शुरुआत में जिस सहजता से कहानी आगे बढ़ती है, बाद में वही प्रवाह थोड़ा कमजोर पड़ता है। और सबसे महत्वपूर्ण फिल्म आपको खूब मुस्कुराती है, लेकिन बहुत कम जगहों पर भावनात्मक रूप से पकड़ती है। अगर विशाल की व्यक्तिगत यात्रा को थोड़ा और समय मिलता, तो फिल्म का असर काफी बढ़ सकता था।
अंतिम फैसला
‘प्रेम कीटाणु’ कोई ऐसी रोमांटिक फिल्म नहीं है जो प्यार की परिभाषा बदलने का दावा करती हो। यह उससे कहीं सरल फिल्म है। यह उन दिनों की कहानी है जब जिंदगी का अगला कदम पता नहीं होता, लेकिन दोस्तों के साथ बैठकर उस अनिश्चितता पर हंसा जा सकता है। यह उस उम्र की कहानी है जहां प्रेम जरूरी है, लेकिन करियर, दोस्ती, आत्मसम्मान और खुद को समझना भी उतना ही जरूरी है।
फिल्म की कहानी कई जगह परिचित रास्ते पर चलती है और इसकी भावनात्मक गहराई इसकी संभावनाओं से कम रह जाती है। लेकिन इसके बावजूद इसकी गर्माहट, कलाकारों की सहजता, दोस्ती वाले दृश्य और हास्य इसे पूरी तरह नीरस होने से बचाते हैं। ‘प्रेम कीटाणु’ की सबसे अच्छी बात यह है कि यह आपको प्रभावित करने के लिए बहुत ज्यादा कोशिश नहीं करती। और इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है, कई जगह यह थोड़ा और जोखिम उठाती, तो एक अच्छी हल्की-फुल्की फिल्म से बढ़कर कुछ यादगार बन सकती थी।
अगर आप भारी-भरकम नाटक से दूर, दोस्ती और रोमांस से सजी एक युवा, हल्की और मनोरंजक फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘प्रेम कीटाणु’ आपके लिए एक सुखद अनुभव हो सकती है, लेकिन अगर आप ऐसी प्रेम कहानी की तलाश में हैं जो किरदारों की भावनात्मक दुनिया को बहुत गहराई से टटोलती हो तो यहां कुछ कमी महसूस होगी।

