बिहार के भोजपुर जिले के तरारी थाना क्षेत्र के रहने वाले नागेंद्र ने पटना स्थित रुबान मेमोरियल अस्पताल के डॉक्टरों और प्रबंधन पर इलाज में गंभीर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि उनकी 76 वर्षीय माता लखमुना देवी को पैरालाइज की शिकायत के बाद 1 जून को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार का दावा है कि शुरुआती जांच के दौरान डॉक्टरों ने एमआरआई में मस्तिष्क में सूजन या ट्यूमर जैसी आशंका जताई थी, लेकिन समय पर सही निर्णय और इलाज नहीं होने से उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
परिजनों के अनुसार 6 जून को अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उनकी माता को कुछ दवाइयां दी गईं, जिसके बाद उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत शुरू हो गई। परिवार का आरोप है कि इसके बाद डॉक्टरों ने संक्रमण होने की बात कहकर उन्हें आईसीयू में भर्ती कर दिया। चार दिन तक इलाज चलता रहा, लेकिन 10 जून को भी डॉक्टरों ने सिर्फ इतना कहा कि ऐसी स्थिति कभी-कभी हो जाती है और इलाज जारी है। परिजनों का आरोप है कि उन्हें मरीज की वास्तविक स्थिति से लगातार अनभिज्ञ रखा गया।
परिवार का कहना है कि 14 जून को अस्पताल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. हिमांशु कुमार ने नागेंद्र के भाई धर्मेंद्र सिंह को फोन कर ऑपरेशन के संबंध में राय मांगी। परिजनों का कहना है कि उन्होंने डॉक्टरों को मरीज के हित में उचित इलाज करने की पूरी अनुमति दे दी थी। इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. अनवर आलम की जांच और निर्णय में तीन दिन का समय लगा दिया। परिवार का आरोप है कि इसी देरी के कारण मरीज की हालत और अधिक गंभीर हो गई।
आरोप है कि 15 जून को मरीज को सांस लेने में दिक्कत बताकर वेंटिलेटर पर रख दिया गया। इसके बाद लगातार 58 दिनों तक वह वेंटिलेटर पर रहीं। परिजनों का कहना है कि अस्पताल वाले उन्हें अपनी माता से मिलने तो देते थे, लेकिन उन्हें छूकर देखने की अनुमति नहीं देते थे। अस्पताल कर्मियों का कहना था कि मरीज को संक्रमण है और यदि परिजन उन्हें छुएंगे तो संक्रमण उन्हें भी फैल सकता है। परिवार का आरोप है कि इसी वजह से वे अपनी माता की वास्तविक शारीरिक स्थिति नहीं देख सके। उनका कहना है कि यदि उन्हें पहले ही उनकी हालत देखने दी जाती तो शायद समय रहते वे किसी दूसरे अस्पताल में ले जाकर बेहतर इलाज करा सकते थे और संभव है कि उनकी मां आज जीवित होतीं या कम से कम उनकी हालत इतनी गंभीर नहीं होती।
नागेंद्र का आरोप है कि 28 जुलाई को उन्होंने अपनी माता को रुबान मेमोरियल अस्पताल से निकालकर दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों ने मरीज की स्थिति देखकर आश्चर्य जताया। परिजनों का दावा है कि उनकी माता की पीठ पूरी तरह गल चुकी थी, शरीर पर गंभीर बेड सोर थे और वहां से तेज दुर्गंध आ रही थी। इसके बाद इलाज के प्रयास किए गए, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ।
परिजनों के अनुसार 29 जुलाई की रात लखमुना देवी ने अंतिम सांस ली। परिवार का आरोप है कि यदि समय रहते उचित इलाज, सही चिकित्सकीय निर्णय और मरीज की वास्तविक स्थिति की जानकारी उन्हें दी जाती, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी।
नागेंद्र का कहना है कि पूरे इलाज के दौरान उनसे 14 लाख 11 हजार रुपये का बिल वसूला गया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें संतोषजनक इलाज नहीं मिला। उनका दावा है कि उनके पास अस्पताल से जुड़ी बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग, इलाज से संबंधित सभी दस्तावेज और भुगतान की रसीदें मौजूद हैं, जो उनके आरोपों का आधार हैं।
परिजनों का कहना है कि जब उन्होंने पूरे मामले की शिकायत पुलिस से करनी चाही तो उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। उनका आरोप है कि पुलिस ने यह कहते हुए संदेह जताया कि इतने बड़े अस्पताल में इस प्रकार की लापरवाही होना संभव नहीं है। परिवार का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें लगातार भ्रम में रखा, मरीज की वास्तविक स्थिति छिपाई और समय पर सही जानकारी नहीं दी। यदि अस्पताल की ओर से पारदर्शिता बरती जाती तो वे समय रहते उचित निर्णय ले सकते थे। परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर रुबान मेमोरियल अस्पताल और जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी पीड़ा का सामना न करना पड़े।
फिलहाल इस मामले में अस्पताल प्रबंधन अथवा संबंधित डॉक्टरों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अस्पताल का पक्ष प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा

